ज्योत्सना सिंह
समय ख़राब हो तो इश्क़ भी हसीन न होकर रंगीन हो जाता है। तभी तो लालाजी का इश्क़ भरी होली में हरा होने की जगह लाल हो गया। हुआ कुछ यूँ कि उम्र का लंबा हिस्सा दोस्तों के बीच शेर बनकर गुज़ार चुके लालाजी के पके हुए दिल को खटखटा गई एक शेरनी। यह शेरनी उन्हें टकरा गई नेट के माया जाल पर। चेहरे की किताब के पन्नें स्ट्रॉल करते हुए एक चेहरे ने उन्हें थोड़ा सा रोका क्या कि वह तो अटक ही गए।
अब मंजर यह कि उसकी तस्वीर से उनकी निगाहें ही नहीं हट रही थीं। बड़ी देर तक उसे दीदे फाड़-फाड़ करके देखते रहे फिर अपनी बकरा दाड़ी खुजाई और दोस्ती का पैग़ाम भेज दिया।
पैग़ाम मिलते ही उधर से तत्काल ही स्वीकृति मिल गई। यह देख लालाजी की बाछें खिल गई। उन्हेंने मैसेंजर पर “हैलो!” लिखकर भेज दिया। गोया कि उस तरफ़ तो जैसे वह फ़ारिग़ ही बैठी थी तुरंत हैलो के ज़वाब में दिल की इमोज़ी के साथ “हाए!” आ गया। लालाजी के तो सोए हुए अरमान यकायक जाग उठे। दफ़्तर में लगे आईने में ख़ुद को निहारा और मैसेज़ किया-“आपका लंच हो गया?”
उधर से तुरंत ज़वाब आया-“क्यों नहीं हुआ होगा तो क्या आप करवा दोगे?”
लालाजी अपने प्यार से पूछे प्रश्न के लिए किसी साधारण से उत्तर के इंतज़ार में थे। ऐसा ज़वाब पाकर खड़बड़ा गए और लिखा-“जी, ऐसी कोई बात नहीं। बस यूँ ही पूछ लिया।”
“क्या बेहूदा सवाल करते है आप जैसे लोग।”
अब लालाजी का दिल किरच-किरच हुआ तो उन्होंने अपनी शराफ़त का पूरा टोकरा लिखकर भेजा-“देखिए,मैं निहायत शरीफ़ इंसान हूँ। बस आपसे बात-चीत करने के उद्देश्य से पूछ लिया आपको बुरा लगा हो तो माफ कीजिए।”
तुरंत ही उधर से एक नंबर ब्लिंक हुआ-“इस पर कॉल करिए।”
अब इधर काटो तो ख़ून नहीं। घबराहट में लिख बैठे-“आप ग़लत समझ रही हैं।”
“अज़ीब इंसान है आप! कॉल करिए बात करनी है।”
तभी लालाजी का दोस्त उधर से निकला इनके चेहरे पर आए पसीने को देख पूछ बैठा-“क्यों मियाँ तुमको क्या हुआ चेहरे पर बारह क्यों बजे है?”
उसकी बात सुनकर लाला जी को याद आया कि वह तो शेर है बस दोस्त को काम की फ़ाइल पकड़ाते हुए बोले-“तुम ये मैटर देखो मैं एक ज़रूरी फ़ोन करके आता हूँ।”
हिम्मत आते ही फ़ोन नंबर डायल कर दिया किंतु पूरी रिंग चली गई और फ़ोन न उठा। वह अपनी हिम्मत को दाद देते हुए विचार मग्न हो गए-‘कॉल करके काम भी ख़त्म हुआ और बात भी नहीं करनी पड़ी।वाह!रे वाह!’
ख़ुशी और ग़म का पूरा ब्यौरा वह लगा भी नहीं पाए थे कि फ़ोन आ गया-“कौन साहब?”
“वाहजी वाह! आप भी कमाल करती हाई हैं। अभी आपने ही तो नंबर दिया था और बात करने को कहा था। ”
“हाँ तो सुनो बे चिंटू ज़्यादा आशिक़ी न सवार हो।”
“जी! क्या मतलब है आपका?”
“क्या जी खाना खा लिया पानी पी लिया?यह सब क्या होता है?”
उसकी खनकती हुई आवाज़ सुनकर लालाजी के घबराया हुए मन ने ढिढ़ाई का साफ़ा कसा और वह और भी मोहित हो गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके ऊपर मोहनी फेंक दी हो और वह उसमें उलझते चले जा रहे हों। अपने उलझे हुए क़िरदार में ही पूरी मर्दानगी से वह बोले-“तो फिर क्या पूछे मोहतरमा! अब पहली ही बार में यह तो पूछ नहीं लेंगे कि क्या आपको हमसे प्यार ही गया? जैसे कि हमको हो गया है तुमसे!”
उस तरफ़ एकदम सन्नाटा हुआ फिर एक उन्मुक्त हँसी सुनाई दी। उस हँसी ने लालाजी के भीतर एक नई स्फूर्ति भर दी और वह कह उठे-“एक कॉफी ही पी लीजिए हमारे साथ।”
इधर से तड़कती हुई आवाज़ आई-“पुलिस डिपार्टमेंट से मोगैंबो बोल रही हूँ। होली में बहके हुए आशिक़ों को चौकी में लाकर गुझिया खिलाने की मुहिम पर हूँ। चल अपनी लोकेशन सेंड कर।”
लालाजी के दिल की गहराई तक नश्तर चल चुका था मुस्कुराते हुए कह उठे-“इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’, कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।”
(लेखिका प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं)