देश की पहली कार जिसके डिजाइन से लेकर निर्माण तक का कार्य भारत की कंपनी ने किया, उस टाटा इंडिका प्रोजेक्ट का श्रेय रतन टाटा के खाते में जाता है। इंडिका के कारण टाटा समूह विश्व मोटर कार बाजार के मानचित्र पर उभरा । 1991 में वह टाटा संस के अध्यक्ष बने और उनके नेतृत्व में टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा टी, टाटा केमिकल्स और इंडियन होटल्स ने भी काफ़ी प्रगति की। टाटा ग्रुप की टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) आज भारत की सबसे बडी सूचना तकनीकी कंपनी है। वह फोर्ड फाउंडेशन के बोर्ड आंफ ट्रस्टीज के भी सदस्य हैं।
कंपनी के नियमानुसार 65 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद वह पद से तो रिटायर हो गए, पर काम करने का जुनून अब भी वही है। उन्होंने अपने 21 साल के मुखिया कार्यकाल में टाटा उद्योग समूह को बहुत आगे बढ़ाया जो अपने आप में एक मिसाल है। टाटा का कहना है कि मिसाल कायम करने के लिए अपना रास्ता स्वयं ही बनाना पड़ता है। रतन टाटा ने अपने उत्तराधिकारी साइरस पलोनजी मिस्त्री को भी यह सलाह दी कि वह रतन टाटा बनने की अपेक्षा अपने मौलिक गुणों और प्रतिभाओं के अनुसार काम करें। इससे वह रतन टाटा से भी आगे जा सकते हैं।
साइरस मिस्त्री, साइरस मिस्त्री बनकर ही रतन टाटा की कामयाबियों से भी आगे जा सकते हैं। साइरस मिस्त्री रतन टाटा बनने की कोशिश करेंगे तो वह ना रतन टाटा बन पाएंगे और ना ही साइरस मिस्त्री रहेंगे। ये अलग बात है कि मिस्त्री को किसी कारणों से 2016 में टाटा उद्योग समूह की अध्यक्षता छोड़नी पड़ी। रतन टाटा ने अपने करिअर के शुरुआती दिनों में नेल्को और सेंट्रल इंडिया टेक्सटाइल जैसी घाटे की कंपनियों को संभाला और उन्हें मुनाफे वाली इकाई में बदल कर अपनी विलक्षण प्रतिभा को सबके सामने पेश किया। इसके बाद से साल दर साल उन्होंने अनेक क्षेत्रों में टाटा का विस्तार किया और सफलता पाई।
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