जुबिली स्पेशल डेस्क
लखनऊ। देश में भ्रष्टाचार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। सरकार लाख दांवे करे कि उसने भ्रष्टïाचार पर लगाम लगायी है लेकिन उसकी नाक के नीचे करोड़ों का घपला हो जाता है और उसे पता तक नहीं चलता है।
इतना ही नहीं भ्रष्टाचार पर परदा डालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। इसका ताजा उदाहरण है कि लॉटरी घोटाला। हालांकि ये आज का घोटाला नहीं है बल्कि घपला वर्ष 1993-94 और 1995-96 में किया गया था।
इस घपलेकी खास बात ये हैं कि लॉटरी का खेल तो अब बंद हो चुका है लेकिन जो घोटाला हुआ तो वो 26 साल पुराना है लेकिन इस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया है और फाइलों में दबा हुआ है। हद तो तब हो गई जब इस घोटाले में कोई कार्रवाई नहीं हुई घोटाले में लिप्त कर्मियों को सजा देने के बजाये उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया गया है।
इसके आलावा संबंधित विभाग के कर्मचारी अन्य विभागों में समायोजित किए जा चुके हैं जबकि भ्रष्टाचार निवारण संगठन (एंटी करप्शन) की जांच में बड़ी गड़बडिय़ां मिलने के बावजूद इस घोटाले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। कनिष्ठ सहायक राजेश गोविल को तो 8 जुलाई को ही आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय में प्रभारी अधिष्ठान का प्रभार सौंपा गया है। आपको बताना चाहेंगे कि लाटरी घपला साल 1993-94 और 1995-96 में हुआ था जिसकी जांच भी की गई। कनिष्ठ सहायक राजेश गोविल पर घपले का आरोप है,
वहीं एंटी करप्शन की रिपोर्ट तो कुछ और कह रही है। पूरे प्रकरण में गृह विभाग ने एंटी करप्शन के पुलिस अधीक्षक की ओर से मार्च 2022 में दी गई थी उसमें कहा गया है कि जीएस नयाल व राजाराम (सेवानिवृत्त बिक्री अधिकारी), केके श्रीवास्ताव (सेवानिवृत्त लेखाकार व कार्यालय प्रभारी), राजेश गोविल, डीएस चौहान व कालिंदी श्रीवास्तव (कनिष्ठ सहायक) के विरुद्ध ऑडिट आपत्तियों एवं घोटालों से संबंधित प्रकरण को बाहर न आने व इस घपले में शामिल लोगों को बचाने की कोशिश की गई है जिसके संबंधित अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं।
क्या था लॉटरी घपला
लॉटरी निदेशालय की सुपर लॉटरी योजना और दो रुपये की लॉटरी से संबंधित यह घपला वर्ष 1993-94 और 1995-96 में किया गया था। निदेशक, विभागीय लेखा की विशेष ऑडिट रिपोर्ट में इस बात के सबूत मिले थे।
इसके बाद गृह विभाग ने एंटी करप्शन को जांच का जिम्मा सौंपा था। इसके बाद साल 2001 में जांच रिपोर्ट सामने आई जिसमें पाया गया है कि निर्धारित सीमा से अधिक गारंटी पुस्कारों के भुगतान से 4 करोड़ 2 लाख 710 रुपये का चूना लगाया गया। साथ ही फर्जी स्टॉकिस्ट लेखों, बिना आवश्यकता के टिकटों की छपाई, विलंब से टिकटों की आपूर्ति, अनियमित प्रिंटिंग और हेराफेरी को लेकर पूरा जिक्र है।
इसके बाद शासन के निर्देश पर तत्कालीन निदेशक, उत्तर प्रदेश राज्य लॉटरी, तत्कालीन वित्त नियंत्रक और 36 अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों को आरोप पत्र दाखिल करने के लिए कहा गया था लेकिन विभागीय जांच में बड़ी लापावाही की गई।
आंतरिक लेखा एवं लेखा परीक्षा निदेशालय के निदेशक हौसिला प्रसाद वर्मा ने जुबली पोस्ट को बताया कि ये मामला काफी पुराना है और अब शासन ने अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट निदेशालय को भेजा है जिसपर निदेशालय द्वारा इस पर यथा शीघ्र कारवाई कर दी जायेगी।