Saturday - 29 March 2025 - 12:29 PM

ऑस्कर अवॉर्ड्स में किस पैमाने पर होती है फिल्मों का चयन, जानें भारतीय फिल्मों की हार की वजह?

जुबिली न्यूज डेस्क 

ऑस्कर अवॉर्ड्स में भारतीय और हिंदी फिल्मों का पिछड़ना हमेशा चर्चा का विषय रहा है। 97वें एकेडमी अवॉर्ड्स में भी भारतीय फिल्मों को कोई पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यों होता है और हमारी फिल्में ऑस्कर की रेस में क्यों पीछे रह जाती हैं? आइए, इसे समझते हैं।

भारत की तरफ से इस बार किरण राव की फिल्म लापता लेडीज को विदेशी भाषा श्रेणी में भेजा गया था, लेकिन इसे पहले ही राउंड में बाहर कर दिया गया। वहीं, ब्रिटिश हिंदी फिल्म संतोष और प्रियंका चोपड़ा की अनुजा जैसी फिल्में भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल थीं, लेकिन इनका भी कुछ खास असर नहीं पड़ा। तो क्या कारण है कि भारतीय फिल्में ऑस्कर अवॉर्ड्स की प्रतियोगिता में क्यों नहीं टिक पातीं?

ऑस्कर अवॉर्ड्स के चयन पैमाने

ऑस्कर अवॉर्ड्स में जो फिल्में बेस्ट पिक्चर या किसी अन्य श्रेणी में शामिल होती हैं, उनके चयन के लिए कुछ विशेष मानक होते हैं। इन मानकों में फिल्म की समसामयिकता, सामाजिक प्रभाव, और उसका सांस्कृतिक संदेश प्रमुख होते हैं। उदाहरण के तौर पर, इस बार अनोरा जैसी फिल्म ने बेस्ट पिक्चर का अवॉर्ड जीता, जो अमेरिकी-रूसी संबंधों पर आधारित थी और उसके अंदर समकालिक मुद्दों को दर्शाया गया था। इसके डायरेक्टर सीन बेकर अपने फिल्म्स के माध्यम से हाशिए पर रहने वाले लोगों की जिंदगी को दर्शाते हैं, और यही उनकी फिल्मों को एक विशेष पहचान दिलाता है।

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समसामयिक और सांस्कृतिक संदर्भ

ऑस्कर अवॉर्ड्स की कमेटी अक्सर उन फिल्मों को प्राथमिकता देती है, जो समसामयिक मुद्दों को छूती हैं या समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हैं। एवरीथिंग एवरीवेयर ऑल एट वंस जैसी फिल्में जो अमेरिकी समाज में रह रहे चीनी अप्रवासियों की कहानी बताती हैं, वही कहानी भी बेस्ट पिक्चर अवॉर्ड प्राप्त करती है। यही नहीं, नोमैडलैंड जैसी फिल्म जो अमेरिकी खानाबदोशों के जीवन को दर्शाती है, उसे भी ऑस्कर मिल चुका है। इन फिल्मों के माध्यम से दुनिया को एक नया दृष्टिकोण दिया जाता है, जो सामाजिक बदलाव की बात करता है।

भारत की फिल्मों के मुकाबले अंतर

भारतीय फिल्मों के विषय और प्रस्तुति अक्सर ज्यादा स्थानीय होते हैं और पश्चिमी दर्शकों के लिए उनके संदर्भ समझना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, भारतीय फिल्मों का पिक्चराइजेशन और सांस्कृतिक संदर्भ भी कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाते। जैसे लापता लेडीज को भारत में खूब सराहा गया, लेकिन वह ओस्कर के चयन के मानकों पर खरी नहीं उतर पाई।

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