Friday - 28 March 2025 - 10:51 PM

International Women’s Day: जानिए भारत की महिलाए कितनी हैं सशक्त और समृद्ध… 

जुबिली न्यूज डेस्क

8 मार्च को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है. यह महिलाओं के सम्मान और उनके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उत्थान को मजबूत बनाने के लिए मनाया जाने वाला एक उत्सव है. इसे आधुनिक समय में महिला अधिकारों की प्रोत्साहन, समाज में समानता के लिए लड़ाई और महिलाओं की उपलब्धियों की उन्नति के लिए समर्पित किया जाता है।

साल 2024 चल रहा हैं. कई क्षेत्रों में महिलाए प्रगति कर रही हैं इसके बावजूद ये सवाल है कि स्वास्थ्य, कार्यस्थल, कारोबार और राजनीति में महिलाओं की वर्तमान समय में स्थिति क्या है? पिछले समय की तुलना में भारत की महिलाएं कितनी प्रगति की हैं इस बात का अंदाजा भारत सरकार के डेटा से लगाया जा सकता है.

अगर हम अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात करें तो भारत सरकार के डेटा से ये पता चलता है कि पिछले कुछ सालों की तुलना में इसमें सुधार हुआ है. हालांकि, विश्लेषक मानते हैं कि अगर क़रीब से इस पर नज़र रखी जाए तो अभी भी सुधार की गुंजाइश है.

सरकार नियमित समय पर श्रमिकों का सर्वे कराती है. इसके डेटा से ये पता चलता है कि श्रमशक्ति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है. साल 2017-18 में श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 23.3 प्रतिशत थी जो साल 2020-21 में बढ़कर 32.5 प्रतिशत हो गई है. भारत में श्रमिक महिलाओं की संख्या बढ़ी है लेकिन ये चुनौतियों के बीच एक उम्मीद की तरह ही नज़र आती है.

बढ़ी हुई संख्या के बावजूद, हज़ारों महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने कोविड के दौरान और बाद में काम छोड़ दिया. आबादी के अनुपात में पुरुषों की बराबरी में पहुंचने के लिए महिला श्रमिक अब भी संघर्ष कर रही हैं. आंबेडकर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर दीपा सिन्हा असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों से जुड़े सटीक डेटा की कमी को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि इसी वजह से श्रमिकों के लैंगिग अनुपात को समझना और भी जटिल हो जाता है.

शिक्षा पूरी करने के बावजूद बच्चों को जन्म देने, मातृत्व अवकाश और बराबर वेतन जैसी चुनौतियों की वजह से कर्मचारियों में महिलाओं की मौजूदगी अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.

डॉ. सिन्हा ज़ोर देकर कहती हैं, “बहुत सी महिलाएं या तो अपनी मर्ज़ी से या फिर दबाव में शिक्षा और काम छोड़ देती हैं और इसी वजह से नेतृत्व वालों पदों पर उनका प्रतिनिधित्व और कम हो जाता है.” वो कहती हैं कि निर्णय लेने वालों पदों में बदलाव रातोरात नहीं हो पाएगा लेकिन कार्यस्थलों पर लैंगिक बराबरी के साथ बेहतर और सुरक्षित माहौल बनाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वे के सबसे ताज़ा डेटा से पता चला है कि शैक्षणिक वर्ष 2020-21 में भारत में 29 लाख से अधिक महिलाओं ने एसटीईएम (विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में दाख़िला लिया है. ये संख्या पुरुषों से अधिक है. इसी दौरान 26 लाख पुरुषों ने इन विषयों में दाख़िला लिया.

2016-17 में एसटीईएम विषयों में दाख़िले के मामले में महिलाएं पुरुषों से पीछे थीं. हालांकि साल 2017-18 में इन विषयों में महिलाओं की संख्या बढ़ी और अगले ही साल यानी 2018-19 में महिलाओं ने इन विषयों में दाख़िला लेने के मामले में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया.ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में कुल एसटीईएम कर्मचारियों में महिलाएं 27 प्रतिशत हैं. हालांकि अब भी पुरुषों और महिलाओं के वेतन में ग़ैर बराबरी बहुत ज़्यादा है. लैंगिग वेतन असामनता के मामले में भारत 146 देशों की सूची में 127वें नंबर पर है.

भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में साल 1999 में 48 महिला सदस्य थीं जिनकी तादाद साल 2019 में बढ़कर 78 पहुंच गई. इसके बाद हुए कुछ स्थानीय चुनावों और उपचुनावों की वजह से ये संख्या और भी बढ़ गई है.

राज्यसभा में भी ऐसा ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है. राज्यसभा के लिए नामित होने वाली महिलाओं की संख्या साल 2012 में 9.8 प्रतिशत से बढ़कर साल 2021 में 12.4 प्रतिशत तक पहुंच गई. हालांकि इससे राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भले ही बढ़ता हुआ दिख रहा है लेकिन पुरुषों की तुलना में ये भी भी बहुत कम ही है.

इकोनॉमिक फ़ोरम की जेंडर पे गैप रिपोर्ट के मुताबिक़ महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में भारत 146 देशों की सूची में 56वें नंबर पर है.

ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश ने महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण में भारत को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष दस देशों में स्थान हासिल किया है. देश में हुए पहले चुनाव से लेकर अब तक राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी में इज़ाफ़ा हुआ है हालांकि अब भी भारत में महिलाओं को अपनी आबादी के हिसाब से संसद में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है.

रामाशेषन कहती हैं कि ये सिर्फ़ किसी एक राजनीतिक दल तक ही सीमित नहीं हैं. साथ ही, महिला आरक्षण विधेयक अब भी क़ानून नहीं बना है और इसी वजह से राजनीतिक दलों में अभी ये लागू नहीं हो सका है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताज़ा डेटा के मुताबिक़ भारत में अब 18 प्रतिशत महिलाओं का बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स ) अभी कम है. हालांकि साल 2015-16 में ये 22.9 प्रतिशत था.

हालांकि, कम वज़न वाली महिलाओं की संख्या भले ही कम हुई है लेकिन मोटापा पुरुषों के मुक़ाबले में महिलाओं में अधिक प्रचलित है. सर्वे से पता चलता है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं मोटापे का शिकार हैं जबकि पुरुषों में ये संख्या 22.9 प्रतिशत है. पोषण से जुड़ी चिंताओं के साथ-साथ, डेटा से पता चलता है कि महिलाओं के सभी आयु वर्गों में एनीमिया लगातार बढ़ रहा है.

भारत में 15-49 आयु वर्ग की 57.2 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक हैं, ये साल 2015-16 में 53.2 प्रतिशत था. इसी आयु वर्ग की गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी दिखाई देती है. सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्यूनिटी हेल्थ से जुड़ी डॉ. स्वाति एचआईवी फ़िज़ीशियन हैं. डॉ. स्वाति कहती हैं कि चिकित्सा शिक्षा को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से कुछ स्वास्थ्य मुद्दों को देखने में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है.

भारत जैसे देश में जहां खाद्य ज़रूरतें पूरा करने के मामले में पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है, एनीमिया पोषण की कमी और ग़रीबी की वजह से भी होता है. इसकी वजह से महिलाएं सभी ज़रूरी पोषक तत्व हासिल नहीं कर पाती हैं और एनीमिया और कुपोषण की शिकार महिलाओं की तादाद बढ़ जाती है.

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