Thursday - 3 April 2025 - 5:43 PM

बीजेपी ने वक्फ बिल क्यों लाया? जानिए इसके पीछे का मकसद!

जुबिली न्यूज डेस्क 
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को लाने के पीछे बीजेपी के मकसद को लेकर कई तरह के कयास और विश्लेषण सामने आए हैं। यह बिल 2 अप्रैल 2025 को लोकसभा में पारित हुआ और 3 अप्रैल को राज्यसभा में पेश किया गया। बीजेपी और सरकार इसे प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता का कदम बताती है, लेकिन विपक्ष और आलोचक इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानते हैं। बीजेपी के संभावित मकसद को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. हिंदुत्व एजेंडा और ध्रुवीकरण
  • विपक्ष का दावा: कांग्रेस, AIMIM, और तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी इस बिल के जरिए मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर धार्मिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। उनका कहना है कि वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण और गैर-मुस्लिम सदस्यों को बोर्ड में शामिल करने जैसे प्रावधानों से मुस्लिम धार्मिक स्वायत्तता पर हमला हो रहा है, जो बीजेपी के हिंदुत्ववादी आधार को मजबूत कर सकता है।
  • संभावित मकसद: बीजेपी का कोर वोट बैंक, जो हिंदू राष्ट्रवाद पर आधारित है, इसे “मुस्लिम तुष्टिकरण” के खिलाफ कदम के रूप में देख सकता है। खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां वक्फ संपत्तियां और मुस्लिम आबादी का प्रभाव है, यह मुद्दा चुनावी लाभ दिला सकता है।
2. वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण और आर्थिक लाभ
  • संपत्ति का दायरा: भारत में वक्फ की 9 लाख एकड़ से अधिक संपत्ति है, जो देश में रक्षा मंत्रालय और रेलवे के बाद तीसरी सबसे बड़ी जमीन मालिक है। इनमें से कई संपत्तियां शहरी इलाकों में हैं और इनकी कीमत अरबों रुपये है।
  • संभावित मकसद: बीजेपी सरकार पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वह ऐसी संपत्तियों को कॉरपोरेट या सरकारी इस्तेमाल के लिए खोलना चाहती है। बिल में जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्ति की स्थिति तय करने का अधिकार देना और सरकारी जमीन पर दावे को खत्म करना इस दिशा में कदम हो सकता है। इससे आर्थिक विकास के नाम पर बड़े प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा मिल सकता है, जो बीजेपी के “विकास” के नैरेटिव को मजबूत करेगा।
3. भ्रष्टाचार पर हमला और सुधार का नैरेटिव
  • सरकारी तर्क: केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन व्याप्त “
है, जिसके कारण वक्फ की आय गरीब मुसलमानों तक नहीं पहुंचती। बीजेपी इसे सुधार के रूप में पेश कर रही है, जिसमें ऑडिट, पारदर्शिता और कमजोर वर्गों (महिलाओं, ओबीसी मुसलमानों) को प्रतिनिधित्व देना शामिल है।
  • संभावित मकसद: बीजेपी इस बिल को “सबका साथ, सबका विकास” के नारे से जोड़कर यह दिखाना चाहती है कि वह मुस्लिम समुदाय के भीतर सुधार ला रही है। यह उसकी छवि को “सुशासन” और “भ्रष्टाचार विरोधी” पार्टी के रूप में मजबूत कर सकता है, जो गैर-हिंदुत्ववादी मतदाताओं को भी आकर्षित करे।
4. विपक्ष को कमजोर करना
  • राजनीतिक रणनीति: विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, सपा, और तृणमूल, मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर हैं। इस बिल के जरिए बीजेपी विपक्ष को “मुस्लिम तुष्टिकरण” के मुद्दे पर घेरना चाहती है। अगर विपक्ष इसका विरोध करता है, तो बीजेपी इसे “भ्रष्टाचार का समर्थन” बताकर उनकी छवि खराब कर सकती है।
  • संभावित मकसद: आने वाले विधानसभा चुनावों (जैसे बिहार 2025) में यह मुद्दा विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला सकता है, जिससे बीजेपी को बढ़त मिले। साथ ही, अगर विपक्ष बिल का समर्थन करता है, तो वह अपने कोर वोट बैंक से दूर हो सकता है।
5. मुस्लिम समाज में सुधार का दावा
  • महिलाओं और कमजोर वर्गों पर फोकस: बीजेपी ने तीन तलाक कानून की तरह ही इस बिल को भी मुस्लिम महिलाओं और कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण से जोड़ा है। बिल में बोर्ड में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी और वक्फ-अल-अवलाद में महिलाओं को विरासत से वंचित न करने का प्रावधान इसका हिस्सा है।
  • संभावित मकसद: इससे बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि वह मुस्लिम समुदाय के भीतर प्रगतिशील बदलाव ला रही है, जिससे उसकी छवि केवल हिंदू-केंद्रित पार्टी से आगे बढ़े। यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत को “सुधारवादी” देश के रूप में पेश कर सकता है।
विश्लेषण: असली मकसद क्या?
बीजेपी के इस कदम के पीछे कई मकसद एक साथ काम कर रहे हैं। यह सच है कि वक्फ बोर्ड में अनियमितताएं रही हैं—जांच में 200 से अधिक संपत्तियों पर अवैध कब्जे और लीज के मामले सामने आए हैं। लेकिन बिल का समय (चुनाव से पहले), गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति, और सरकारी हस्तक्षेप के प्रावधान इसे राजनीतिक रंग देते हैं।
  • प्राथमिक मकसद: संभवतः बीजेपी का मुख्य लक्ष्य अपने हिंदुत्ववादी आधार को मजबूत करना और विपक्ष को कमजोर करना है, साथ ही आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाना।
  • द्वितीयक मकसद: सुधार का नैरेटिव बनाकर मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से को अपने पक्ष में करना और वैश्विक मंच पर प्रगतिशील छवि पेश करना।
बीजेपी का मकसद शुद्ध रूप से सुधारवादी नहीं है, जैसा वह दावा करती है, न ही यह पूरी तरह “मुस्लिम विरोधी” है, जैसा विपक्ष कहता है। यह एक बहुस्तरीय रणनीति है, जिसमें राजनीतिक लाभ, आर्थिक नियंत्रण, और सामाजिक ध्रुवीकरण का मिश्रण है। इसका असली प्रभाव कानून लागू होने और उसके इस्तेमाल पर निर्भर करेगा। फिलहाल, यह बीजेपी के लिए एक “हाई रिस्क, हाई रिवॉर्ड” दांव है, जो भारत की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
Radio_Prabhat
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